आपके इस प्रबुद्ध, सुंदर और प्रेरणादायी आलेख के लिए अंतःकरण से आभार। आपके इस लेख ने मेरे मानस-पटल पर एक नए विचार को जन्म दिया है कि जिस प्रकार भुवन में प्रवाहित होने वाली तमाम नदियां धरा का और मनुष्यों का पोषण करती हैं, ठीक उसी प्रकार ज्ञान की धारा भी भिन्न-भिन्न संस्कृतियों और परिवेशों में विविध रूपों में प्रवहमान है। जैसा कि आपने रेखांकित किया, इन समस्त ग्रंथों और मनीषियों के दर्शन मानव-मात्र के कल्याण के लिए ही हैं। यद्यपि इनमें वैचारिक भिन्नताएं प्रतीत हो सकती हैं, किंतु इसका यह कदापि अर्थ नहीं कि वे परस्पर विरोधी हैं; सबका गंतव्य और मूल लक्ष्य एक ही है—मनुष्य की प्रज्ञा और मेधा को परिष्कृत कर उसे चेतना के सर्वोच्च शिखरों तक पहुँचाना।
तथापि, एक सत्य-पथिक और अन्वेषक की जिज्ञासा के रूप में मन में यह प्रश्न भी उठता है कि आदिकाल से लेकर अद्यतन युग तक अनेकों दर्शन, ग्रंथ, युग-प्रवर्तक और समाज-सुधारक हुए, किंतु आज वर्तमान समय की जो विडंबनापूर्ण स्थिति है, क्या वह किसी भी प्रकार से उचित या संतोषजनक है? इसका उत्तर 'नहीं' में ही मिलता है, और इसके पीछे एक गंभीर प्रश्नचिह्न अंकित है।
जहाँ तक मेरे अनुभव की क्षितिज है, इस ब्रह्मांड में 'होने' और 'करने' का विधान सर्वथा भिन्न है। हम केवल 'कर्म' यानी 'करने' के धरातल पर स्वतंत्र हैं, संपूर्ण विधान 'होना' हमारे नियंत्रण में नहीं है। इसीलिए इसी शाश्वत नियम के अंतर्गत आदिकाल से लेकर आज तक सभी महान विभूतियों—चाहे वे अवतार हों, प्रवर्तक हों या समकालीन मनीषी—सबने अपने-अपने नियत दायित्व का निर्वहन किया है। इसी ऋजु मार्ग पर चलते हुए हम सभी का भी यह कर्तव्य है कि एक छोटे से सिपाही की भांति सत्य, अच्छाई और उदात्त विचारों के विस्तार में अपना स्वल्प किंतु निष्ठावान योगदान दें।
इस संपूर्ण वैचारिक संघर्ष में सबसे सुंदर तथ्य यह है कि अच्छाई और बुराई के इस चिरंतन द्वंद्व में जीत या हार का कोई प्रश्न ही नहीं है, वरन कसौटी इस बात की है कि हम कितनी तल्लीनता, पवित्रता और निष्काम भाव से अपनी भूमिका का निर्वाह करते हैं। जीवन के अब तक के सफ़र में मैंने यह अनुभव किया है कि शास्त्रों की दुरूह परिभाषाओं और जटिल दर्शन-साधना में उलझना हर साधारक़ के वश की बात नहीं है; किंतु यदि हमारा यह सार्वभौमिक समाज प्रेम, सेवा और 'समानुभूति' (Empathy) के बुनियादी सिद्धांतों को अपने आचरण में उतार ले, तो इस धरा पर विश्व-शांति, बंधुत्व और अछ्वुत सौहार्द की स्थापना सहज ही संभव हो सकती है।
आपके इस भावपूर्ण और स्पष्ट प्रश्न ने मन को आनंदित कर दिया।
मैंने पूरी गीता तो नहीं पढ़ी, लेकिन उसके दो श्लोकों पर अपने जीवन को अर्पित कर दिया है—पहला, "कर्मण्येवाधिकारस्ते..." और दूसरा, "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज..."।
पहले मुझे कुछ परेशानी होने लगी क्योंकि पहले श्लोक में विहित और अविहित कर्मों का ज्ञान जरूरी था, और एक साधारण मनुष्य के लिए शास्त्रों की वह जटिलता समझना कठिन है। इसलिए मैंने दूसरे श्लोक को अपनाकर उसका अभ्यास शुरू कर दिया।
जहाँ तक आपके दूसरे प्रश्न की बात है, यहीं पर नियति का क्रूर नियम लागू होता है। हाँ, मैं दीक्षित भी हूँ और साधनारत भी था, किंतु परिस्थितियों की जटिलता इतनी बढ़ गई कि अब सिर्फ कर्मयोग का ही सहारा है, अर्थात नियमित अभ्यास नहीं कर पाता।
आपके इस प्रबुद्ध, सुंदर और प्रेरणादायी आलेख के लिए अंतःकरण से आभार। आपके इस लेख ने मेरे मानस-पटल पर एक नए विचार को जन्म दिया है कि जिस प्रकार भुवन में प्रवाहित होने वाली तमाम नदियां धरा का और मनुष्यों का पोषण करती हैं, ठीक उसी प्रकार ज्ञान की धारा भी भिन्न-भिन्न संस्कृतियों और परिवेशों में विविध रूपों में प्रवहमान है। जैसा कि आपने रेखांकित किया, इन समस्त ग्रंथों और मनीषियों के दर्शन मानव-मात्र के कल्याण के लिए ही हैं। यद्यपि इनमें वैचारिक भिन्नताएं प्रतीत हो सकती हैं, किंतु इसका यह कदापि अर्थ नहीं कि वे परस्पर विरोधी हैं; सबका गंतव्य और मूल लक्ष्य एक ही है—मनुष्य की प्रज्ञा और मेधा को परिष्कृत कर उसे चेतना के सर्वोच्च शिखरों तक पहुँचाना।
तथापि, एक सत्य-पथिक और अन्वेषक की जिज्ञासा के रूप में मन में यह प्रश्न भी उठता है कि आदिकाल से लेकर अद्यतन युग तक अनेकों दर्शन, ग्रंथ, युग-प्रवर्तक और समाज-सुधारक हुए, किंतु आज वर्तमान समय की जो विडंबनापूर्ण स्थिति है, क्या वह किसी भी प्रकार से उचित या संतोषजनक है? इसका उत्तर 'नहीं' में ही मिलता है, और इसके पीछे एक गंभीर प्रश्नचिह्न अंकित है।
जहाँ तक मेरे अनुभव की क्षितिज है, इस ब्रह्मांड में 'होने' और 'करने' का विधान सर्वथा भिन्न है। हम केवल 'कर्म' यानी 'करने' के धरातल पर स्वतंत्र हैं, संपूर्ण विधान 'होना' हमारे नियंत्रण में नहीं है। इसीलिए इसी शाश्वत नियम के अंतर्गत आदिकाल से लेकर आज तक सभी महान विभूतियों—चाहे वे अवतार हों, प्रवर्तक हों या समकालीन मनीषी—सबने अपने-अपने नियत दायित्व का निर्वहन किया है। इसी ऋजु मार्ग पर चलते हुए हम सभी का भी यह कर्तव्य है कि एक छोटे से सिपाही की भांति सत्य, अच्छाई और उदात्त विचारों के विस्तार में अपना स्वल्प किंतु निष्ठावान योगदान दें।
इस संपूर्ण वैचारिक संघर्ष में सबसे सुंदर तथ्य यह है कि अच्छाई और बुराई के इस चिरंतन द्वंद्व में जीत या हार का कोई प्रश्न ही नहीं है, वरन कसौटी इस बात की है कि हम कितनी तल्लीनता, पवित्रता और निष्काम भाव से अपनी भूमिका का निर्वाह करते हैं। जीवन के अब तक के सफ़र में मैंने यह अनुभव किया है कि शास्त्रों की दुरूह परिभाषाओं और जटिल दर्शन-साधना में उलझना हर साधारक़ के वश की बात नहीं है; किंतु यदि हमारा यह सार्वभौमिक समाज प्रेम, सेवा और 'समानुभूति' (Empathy) के बुनियादी सिद्धांतों को अपने आचरण में उतार ले, तो इस धरा पर विश्व-शांति, बंधुत्व और अछ्वुत सौहार्द की स्थापना सहज ही संभव हो सकती है।
Do you read the Gita and meditate daily Namaste? Ps Sat is truth
आपके इस भावपूर्ण और स्पष्ट प्रश्न ने मन को आनंदित कर दिया।
मैंने पूरी गीता तो नहीं पढ़ी, लेकिन उसके दो श्लोकों पर अपने जीवन को अर्पित कर दिया है—पहला, "कर्मण्येवाधिकारस्ते..." और दूसरा, "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज..."।
पहले मुझे कुछ परेशानी होने लगी क्योंकि पहले श्लोक में विहित और अविहित कर्मों का ज्ञान जरूरी था, और एक साधारण मनुष्य के लिए शास्त्रों की वह जटिलता समझना कठिन है। इसलिए मैंने दूसरे श्लोक को अपनाकर उसका अभ्यास शुरू कर दिया।
जहाँ तक आपके दूसरे प्रश्न की बात है, यहीं पर नियति का क्रूर नियम लागू होता है। हाँ, मैं दीक्षित भी हूँ और साधनारत भी था, किंतु परिस्थितियों की जटिलता इतनी बढ़ गई कि अब सिर्फ कर्मयोग का ही सहारा है, अर्थात नियमित अभ्यास नहीं कर पाता।